तफ़सीर – सूरतुल फ़ातिहा

तफ़सीर – सूरतुल फ़ातिहा

 

 

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला.
अल्लाह की तअरीफ़ और उसके हबीब पर दुरुद.

सूरए फ़ातिहा:

اَلْحَمْدُ لِلّٰهِ رَبِّ الْعٰلَمِیْنَۙ(۱)الرَّحْمٰنِ الرَّحِیْمِۙ(۲)مٰلِكِ یَوْمِ الدِّیْنِؕ(۳)اِیَّاكَ نَعْبُدُ وَ اِیَّاكَ نَسْتَعِیْنُؕ(۴)اِهْدِنَا الصِّرَاطَ الْمُسْتَقِیْمَۙ(۵)صِرَاطَ الَّذِیْنَ اَنْعَمْتَ عَلَیْهِمْ غَیْرِ الْمَغْضُوْبِ عَلَیْهِمْ وَ لَا الضَّآلِّیْنَ۠(۷)

तर्जुमा:

سب خوبیاں اللہ کو جو مالک سارے جہان والوں کا(1) بہت مہربان رحمت والا(2) روزِ جزاء کا مالک(3) ہم تجھی کو پوجیں اور تجھی سے مدد چاہیں(4) ہم کو سیدھا راستہ چلا(5) راستہ اُن کا جن پر تُو نے احسان کیا،(6) نہ ان کا جن پر غضب ہوا اور نہ بہکے ہوؤں کا(7)

सूरए फ़ातिहा के नाम:

इस सूरत के कई नाम हैं – फ़ातिहा, फ़ातिहतुल किताब, उम्मुल कुरआन, सूरतुल कंज़, काफ़िया, वाफ़िया, शाफ़िया, शिफ़ा, सबए मसानी, नूर, रूकैया, सूरतुल हम्द, सूरतुद दुआ, तअलीमुल मसअला, सूरतुल मनाजात, सूरतुल तफ़वीद, सूरतुस सवाल, उम्मुल किताब, फ़ातिहतुल कुरआन, सूरतुस सलात.

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इस सूरत में 7️⃣आयतें, सत्ताईस कलिमे, एक सौ चालीस अक्षर हैं. कोई आयत नासिख़ या मन्सूख़ नहीं.

शाने नजूल यानी किन हालात में उतरी:

ये सूरत मक्कए मुकर्रमा या मदीनए मुनव्वरा या दोनों जगह उतरी . अम्र बिन शर्जील का कहना है कि नबीये करीम (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम – उनपर अल्लाह तआला के दुरूद और सलाम हों) ने हज़रत ख़दीजा( रदियल्लाहो तआला अन्हा – उनसे अल्लाह राज़ी) से फ़रमाया- मैं एक पुकार सुना करता हूँ जिसमें “इकरा” यानी पढ़ो कहा जाता है. वरका बिन नोफ़िल को खबर दी गई, उन्होंने अर्ज़ किया- जब यह पुकार आए, आप इत्मीनान से सुनें. इसके बाद हज़रत जिब्रील ने खिदमत में हाज़िर होकर अर्ज़ किया-
फ़रमाइये बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम. अल्हम्दु लिल्लाहे रब्बिल आलमीन- यानी अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान, रहमत वाला, सब खूबियाँ अल्लाह को जो मालिक सारे जहान वालों का. इससे मालूम होता है कि उतरने के हिसाब से ये पहली सूरत है मगर दूसरी रिवायत से मालूम होता है कि पहले सूरए इकरा उतरी. इस सूरत में सिखाने के तौर पर बन्दों की ज़बान में कलाम किया गया है.

नमाज़ में इस सूरत का पढ़ना वाजिब यानी ज़रूरी है. इमाम और अकेले नमाज़ी के लिये तो हकीकत में अपनी ज़बान से, और मुक़तदी के लिये इमाम की ज़बान से. सही हदीस में है कि इमाम का पढ़ना ही उसके पीछे नमाज़ पढ़ने वाले का पढ़ना है.

कुरआन शरीफ में इमाम के पीछे नमाज़ पढ़ने वाले को खामोश रहने और इमाम जो पढ़े उसे सुनने का हुक्म दिया गया है. अल्लाह तआला फरमाता है कि जब क़ुरआन पढ़ा जाए तो उसे सुनो और ख़ामोश रहो. मुस्लिम शरीफ़ की हदीस है कि जब इमाम कुरआन पढ़े, तुम ख़ामोश रहो. और बहुत सी हदीसों में भी इसी तरह की बात कही गई है. जनाज़े की नमाज़ में दुआ याद न हो तो दुआ की नियत से सूरए फ़ातिहा पढ़ने की इजाज़त है. कुरआन पढ़ने की नियत से यह सूरत नहीं पढ़ी जा सकती.

सूरतुल फ़ातिहा की खूबियाँ :

हदीस की किताबों में इस सूरत की बहुत सी खूबियाँ बयान की गई हैं. हुजूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फरमाया तौरात व इंजील व ज़ुबूर में इस जैसी सूरत नहीं उतरी.(तिरमिजी). एक फ़रिश्ते ने आसमान से उतरकर हुजूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर सलाम अर्ज़ किया और दो ऐसे नूरों की खुशखबरी सुनाई जो हुजूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से पहले किसी नबी को नहीं दिये गए. एक सूरए फ़ातिहा दूसरे सुरए बक़र की आखिरी आयते. (मुस्लिम शरीफ़) सूरए फ़ातिहा हर बीमारी के लिये दवा है. (दारमी) सूरए फ़ातिहा सौ बार पढ़ने के बाद जो दुआ मांगी जाए अल्लाह तआला उसे कुबूल फ़रमाता है.(दारमी)

इस्तिआज़ा : कुरआन शरीफ़ पढ़ने से पहले “अऊज़ो बिल्लाहे मिनश शैतानिर रजीम” (अल्लाह की पनाह मांगता हूँ भगाए हुए शैतान से) पढ़ना प्यारे नबी का तरीका यानी सुन्नत है. (वाज़िन) लेकिन शागिर्द अगर उस्ताद से पढ़ता हो तो उसके लिये सुन्नत नहीं हैं. (शामी) नमाज़ में इमाम और अकेले नमाज़ी के लिये सना यानी सुहानकल्लाहुम्मा पढ़ने के बाद आहिस्ता से “अऊज़ो विल्लाहे मिनश शैतानिर रजीम’ पढ़ना सुन्नत है. (शामी)

तस्मियह : “बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम” कुरआने पाक की आयत है मगर सूरए फ़ातिहा या किसी और सूरत का हिस्सा नहीं है, इसी लिये नमाज़ में ज़ोर के साथ न पढ़ी जाए. बुख़ारी और मुस्लिम में लिखा है कि नबी (उनपर अल्लाह के दुरूद और सलाम) और हज़रत सिद्दीक़ और फ़ारूक़(अल्लाह उनसे राजी) अपनी नमाज़”अल्हम्दो लिल्लाहे रब्बिल आलमीन’ यानी सूरह फ़ातिहा की पहली आयत से शुरू करते थे. तरावीह (रमजान में रात की ख़ास नमाज़) में जो ख़त्म किया जाता है उसमें कहीं एक बार पूरी बिस्मिल्लाह ज़ोर से ज़रूर पढ़ी जाए ताकि एक आयत बाक़ी न रह जाए.

कुरआन शरीफ़ की हर सूरत बिस्मिल्लाह से शुरू की जाए, सिवाय सूरए बराअत या सूरए तौबह के. सूरए नम्ल में सज्दे की आयत के बाद जो बिस्मिल्लाह आई है वह मुस्तकिल आयत नहीं है बल्कि आयत का एक टुकड़ा है. इस आयत के साथ ज़रूर पढ़ी जाएगी, आवाज़ से पढ़ी जाने वाली नमाज़ों में आवाज़ के साथ और खामोशी से पढ़ी जाने वाली नमाज़ों में खामोशी से. हर अच्छे काम की शुरूआत बिस्मिल्लाह पढ़कर करना अच्छी बात है. बुरे काम पर बिस्मिल्लाह पढ़ना मना है,

सूरए फ़ातिहा में क्या क्या है ?

इस सूरत में अल्लाह तआला की तारीफ़, उसकी बड़ाई, उसकी रहमत, उसका मालिक होना, उससे इबादत, अच्छाई, हिदायत, हर तरह की मदद तलब करना, दुआ मांगने का तरीका, अच्छे लोगों की तरह रहने और बुरे लोगों से दूर रहने, दुनिया की ज़िन्दगी का खातिमा, अच्छाई और बुराई के हिसाब के दिन का साफ़ साफ़ बयान है।

1️⃣ हम्द यानी अल्लाह की बड़ाई बयान करना:

हर काम की शुरुआत में बिस्मिल्लाह की तरह अल्लाह की बड़ाई का बयान भी ज़रूरी है. कभी अल्लाह की तारीफ़ और उसकी बड़ाई का बयान अनिवार्य या वाजिब होता है जैसे जुमुए के ख़ुत्वे में, कभी मुस्तहब यानी अच्छा होता है जैसे निकाह के ख़ुत्वे में या दुआ में या किसी अहम काम में और हर खाने पीने के बाद, कभी सुन्नते मुअक्कदा (यानी नबी का बह तरीका जिसे अपनाने की ताकीद आई हो) जैसे छींक आने के बाद.(तहतावी)

2️⃣ “रब्बिल आलमीन” (यानी मालिक सारे जहान वालों का) में इस बात की तरफ़ इशारा है कि सारी कायनात या समस्त सृष्टि अल्लाह की बनाई हुई है और इसमें जो कुछ है वह सब अल्लाह ही की मोहताज है, और अल्लाह तआला हमेशा से है और हमेशा के लिये हैं, जिन्दगी और मौत के जो पैमाने हमने बना रखे हैं, अल्लाह उन सब से पाक है वह कुदरत वाला है . “रब्बिल आलमीन” के दो शब्दों में अल्लाह से तअल्लुक रखने वाली हमारी जानकारी की सारी मन्ज़िले तय हो गई.

3️⃣ “मालिके यौमिद्दीन” (यानी इन्साफ़ वाले दिन का मालिक) में यह बता दिया गया कि अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक नहीं है क्योंकि सब उसकी मिल्क में है और जो ममलूक यानी मिल्क में होता है उसे पूजा नहीं जा सकता. इसी से मालूम हुआ कि दुनिया कर्म की धरती है और इसके लिये एक आखिर यानी अन्त है . दुनिया के ख़त्म होने के बाद एक दिन जज़ा यानी बदले या हिसाव का है . इससे पुनर्जन्म का सिद्धान या नज़रिया ग़लत साबित हो गया.

4️⃣ “इय्याका नअबुदु” (यानी हम तुझी को पूजें) अल्लाह की ज़ात और उसकी खूबियों के बयान के बाद यह फ़रमाना इशारा करता है कि आदमी का अकीदा उसके कर्म से ऊपर है और इबादत या पूजा पाठ का कुबूल किया जाना अक़ीदे की अच्छाई पर है. इस आयत में मूर्ति पूजा यानी शिर्क का भी रद्द है कि अल्लाह तआला के सिवा इबादत किसी के लिये नहीं हो सकती.

+ “ब इय्याका नस्तईन” (यानी और तुझी से मदद चाहें) में यह सिखाया गया कि मदद चाहना, चाहे किसी माध्यम या वास्ते से हो, या फिर सीधे सीधे या डायरैक्ट, हर तरह अल्लाह तआला के साथ खास हैं. सच्चा मदद करने वाला वही है, बाकी मदद के जो ज़रिये या माध्यम हैं वो सब अल्लाह ही की मदद के प्रतीक या निशान हैं. बन्दे को चाहिये कि अपने पैदा करने वाले पर नजर रखे और हर चीज़ में उसी के दस्ते कुदरत को काम करता हुआ माने इससे यह समझना कि अल्लाह के नबियों और बलियों से मदद चाहना शिर्क है, ऐसा समझाना गलत है क्योंकि जो लोग अल्लाह के करीबी और ख़ास बन्दे हैं उनकी इमदाद दरअसल अल्लाह ही की मदद है. अगर इस आयत के वो मानी होते जो वहाबियों ने समझे तो क़ुरआन शरीफ़ में “अईनूनी बि कुव्वतिन” और “इस्तईनू बिस सब्रे वस्सलाह’ क्यों आता, और हदीसों में अल्लाह वालों से मदद चाहने की तालीम क्यों दी जाती.

5️⃣ “इहदिनस सिरातल मुस्तकीम” (यानी हम को सीधा रास्ता चला) इसमें अल्लाह तआला की ज़ात और उसकी खूबियों की पहचान के बाद उसकी इबादत, उसके बाद दुआ की तालीम दी गई है. इससे यह मालूम हुआ कि बन्दे को इबादत के बाद दुआ में लगा रहना चाहिये. हदीस शरीफ़ में भी नमाज के बाद दुआ की तालीम दी गई है.(तिबरानी और बेहिक़ी) सिराते मुस्तकीम का मतलब इस्लाम या कुरआन या नबीये करीम (अल्लाह के दुरुद और सलाम उनपर) का रहन सहन या हुजूर या हुजूर के घर वाले और साथी हैं, इससे साबित होता है कि सिराते मुस्तकीम यानी सीधा रास्ता एहले सुन्नत का तरीका है जो नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के घराने वालों, उनके साथी और सुन्नत व कुरआन और मुस्लिम जगत सब को मानते हैं।

6️⃣ “सिरातल लज़ीना अनअम्ता अलैहिम” (यानी रास्ता उनका जिनपर तूने एहसान किया) यह पहले वाले वाक्य या जुमले की तफ़सीर यानी विवरण है कि सिराते मुस्तकीम से मुसलमानों का तरीका मुराद है. इससे बहुत सी बातों का हल निकलता है कि जिन बातों पर बुजुर्गों ने अमल किया वही सीधा रास्ता की तारीफ़ में आता है।

7️⃣ “गैरिल मगदूबे अलैहिम वलद दॉल्लीन” (यानी न उनका जिनपर गज़ब हुआ और न बहके हुओं का) इसमें हिदायत दी गई है कि सच्चाई की तलाश करने वालों को अल्लाह के दुश्मनों से दूर रहना चाहिये और उनके रास्ते, रस्मों और रहन सहन के तरीके से परहेज़ रखना ज़रूरी है. हदीस की किताब तिरमिज़ी में आया है कि “मगदूबे अलैहिम” यहूदियों और “दॉल्लीन” ईसाइयों के लिये आया है.

सूरए फातिहा के खत्म पर ‘आमीन’ कहना सुन्नत यानी नबी का तरीका है. “आमीन’ के मानी हैं, “ऐसा ही कर” या “कुबूल फ़रमा”. ये क़ुरआन का शब्द नहीं है. सूरए फ़ातिहा नमाज़ में पढ़ी जाए या नमाज़ के अलावा, इसके आखिर में आमीन कहना सुन्नत है.
हज़रत इमामे अअज़म का मज़हब यह है कि नमाज़ में आमीन आहिस्ता या धीमी आवाज़ में कही जाए।

📓 [ कंजुल ईमान, हिंदी तर्जुमा कलामुर रहमान सफ़ह 5,6,7 ]

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