जिंदगी का हासिल है आरजू मदीने की

 
जिंदगी का हासिल है आरजू मदीने की
क्यों न हो अब हर लम्हा जुस्तजू मदीने की
हम मदीना गुम आये, झालियो को चूम आये
जब किसी ने छेड़ी है गुफ्तगू मदीने की

गमजदो को गम अपने याद ही नही रहते
जब बहार होती है रूबरू मदीने की
जिसको जो भी मिलता है किसके डरे से मिलता है
बट रही है खेराते चार सु मदीने की
तीरगी में रह कर भी रौशनी में रहता है
जिसके दिल में गर्क कर ले जुस्तजू मदीने की
किस लिये बसाते है लोग गुल को दामन मे
है बसी हुई खालिद गुल में बू मदीने की
मुझको मेरे मुर्शिद ने बात ये बताई है
जो नबी का हो जाए उसकी कुल खुदाई है
यु तो जहाँ में पीर बहुत है, ए बरकतियो
मेरे रज़ा का मुर्शिद होना सबके बस की बात नही !
देख तो नियाज़ी ज़रा सो गया क्या दीवाना,
उनकी याद मै शायद आँख लग गई होगी

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