कोई दुनिया-ए-अता में नहीं हमता तेरा | तज़मीन – वाह ! क्या जूद-ओ-करम है, शह-ए-बतहा ! तेरा / Koi Duniya-e-Ata Mein Nahin Hamta Tera | Tazmeen of Waah ! Kya Jood-o-Karam Hai, Shah-e-Bat.ha ! Tera

कोई दुनिया-ए-‘अता में नहीं हमता तेरा
हो जो हातिम को मुयस्सर ये नज़ारा तेरा
कह उठे देख के बख़्शिश में ये रुत्बा तेरा
वाह ! क्या जूद-ओ-करम है, शह-ए-बतहा ! तेरा
नहीं सुनता ही नहीं माँगने वाला तेरा
कुछ बशर होने के नाते तुझे ख़ुद सा जानें !
और कुछ महज़ पयामी ही ख़ुदा का जानें !
इन की औक़ात ही क्या है कि ये इतना जानें !
फ़र्श वाले तेरी शौकत का ‘उलू क्या जानें !
ख़ुसरवा ! अ़र्श पे उड़ता है फरेरा तेरा
मुझ से ना-चीज़ पे है तेरी ‘इनायत कितनी
तू ने हर गाम पे की मेरी हिमायत कितनी
क्या बताऊँ ! तेरी रहमत में है वुस’अत कितनी
एक मैं क्या ! मेरे ‘इस्याँ की हक़ीक़त कितनी !
मुझ से सो लाख को काफ़ी है इशारा तेरा
नज़र-ए-‘उश्शाक़-ए-नबी है ये मेरा हर्फ़-ए-ग़रीब
मिम्बर-ए-वा’ज़ पे लड़ते रहें आपस में ख़तीब
ये अक़ीदा रहे अल्लाह करे मुझ को नसीब
मैं तो मालिक ही कहूँगा कि हो मालिक के हबीब
या’नी महबूब-ओ-मुहिब में नहीं मेरा तेरा
कई पुश्तों से ग़ुलामी का ये रिश्ता है बहाल
यहीं तिफ़्ली-ओ-जवानी के बिताए मह-ओ-साल
अब बुढ़ापे में, ख़ुदारा ! हमें यूँ दर से न टाल
तेरे टुकड़ों पे पले ग़ैर की ठोकर पे न डाल
झिड़कियाँ खाएँ कहाँ छोड़ के सदक़ा तेरा
तुझ से हर-चंद वो हैं क़द्र-ओ-फ़ज़ाइल में रफ़ी’अ
कर, नसीर ! आज मगर फ़िक्र-ए-रज़ा की तौसी’अ
पास है उस के शफ़ा’अत का वसीला भी वक़ी’अ
तेरी सरकार में लाता है रज़ा उस को शफ़ी’अ
जो मेरा ग़ौस है और लाडला बेटा तेरा

By sulta